लखनऊ की पुराने समय में''कोठों की नबाबी''
![]() | |
| राहुल त्रिपाठी |
हुजूर ! अब वो नबाबी कहां जो कभी लखनऊ चैक में गुलजार रहा करती थी। उर्दू शेयरो-शायरी रुहानी सुकून दिया करती थी खुदाखैर करे उन शख्सियतों का जो अब शौकिया ही सही शहर की उर्दू आबरू को बचाने के लिये दबी जुबान से ही महफिलों में दो-चार लाइने नश्र कर देते हैं, वरना अब तो तबायफों की जगह लूटपाट करने वाली जालिम बार-बालाओं ने ले लिया है वो भी गुपचुप ढंग से। अंग्रेज हुक्म्रान नबाबी शौक का सुपुर्द-ए-खाक कर वतन लौट चुके हैं लेकिन शहरी तनहाई में अब जाये तो जायें कहां ?
कोठों में शमां रोशन करने वालीं तबायफें अब तो इतिहास की किताबों में ही नसीब हो पा रही हैं, हां उनके याद को ताजा करने के लिये कोठियां आज भी चैक में आपके के दीदार को तरस रहीं हैं। जहां कभी पायलों की छम-छम और तबलों की थाप सुनायी दिया करती थी। मुंह में पान का वीणा दबायें बग्गी में बैठे नबाब यहां के तंग रास्तों घूमा करते थे। चैक की गलियां लखनऊ की नबाबी परंपरा का रुतबा हुआ करती थीं।
आज जैसा जालिम दौर न था कि तनहाई में शोषण किया, लूटा-लुटाया और नौ दो ग्यारह, वो जमाना जुबान का था तब बड़े-बड़े नबाबजादे शाम ढलते ही बग्गियों से ताम-झाम से तबायफों की कोठियों पर तशरीफ लाया करते थे और तो और लुकछिप कर ही नही, बल्कि बहुत से उदाहरण ऐसे हैं जहां कई नबाबजादों ने अपनी बेगम से ज्यादा इनको तबज्जो दी। नबाबी का मतलब शोषण आलिंगन ही नही था बल्कि तबायफों आकर्षक आदायें और उनकी शेरों शायरी उनकी विशेषता हुआ करती थी। बहुत सी तबायफें उर्दू अदब की लेखनी की नुमाइदगी करने वाली रही हैं। उनकी काबिलियत आज भी उर्दू पसन्दों के लिये पहेली बना हुआ है। कोठों पर ऐसी महफिलें सजती थीं कि आसपास के जमींदार, जगीरदार यहां शिरकत किया करते थे।
लखनऊ चैक में आज भी कई कोठियां ऐसी हैं जिनकी मलिकियत कोठों से सबंध रखती है और कई तो वर्तमान की भेंट चढ़ चुकीं हैं। यहां के नबाब इनसे कभी नही ऊबे लेकिन गोरों के आने के बाद से इनकी तबाही आरंभ हो गई। नतीजतन कोठों पर गोरी चमड़ी के हुक्मराॅनों को कहर। बेचारी दिल बहलाकर लोगों की तनहाई में संग रहने वाली ऐसी तबायफों को अपना शहर छोड़ आस पर के जिलों में पनाह लेनी पड़ी। सर्वाधिक कानपुर इनकी खपत हुई। जी हाॅ कानपुर शहर के लाठी मोहाल, मूलगंज, सुतरखाना ऐसे इलाके हैं जहां कभी मुजरा, सूफी गाने-बजाने के दौर चला करते थे। दरहम-फरहम हो चुकी तबायफों की जिन्दगी धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ने लगी। खूबसूरत अदायें और मीठी जुबान से लबरेज नौयौवनायें कमाई के लिये बनारस, फैजाबाद, सीतापुर, झांसी जैसे जिलों में भी गईं, जहां उन्हें वो रुतबा कभी भी हासिल नही हो सका और उनका धंधा गंदा होता चला गया।
सबसे अधिक गौर करने वाली बात यह है कि आजादी के लड़ाई में भी तबायफों की भूमिका रही है। यहीं कारण है कि अंग्रेज हुक्मराॅन शहर आते ही कहर इन्ही पर बरपाया करते थे। अंगे्रज कोठों की परंपरा को नजायज मानते थे, वहीं मुस्लिमों में तब नबाबी शौक समझा जाता था। लेकिन अंग्रेजों ने इन्हें तितर-बितर कर पूरी कौम को गंदा करने में अहम् भूमिका अदा की। वरना 1857 से पूर्व ये सब इतना गंदा नही जितना अंग्रेजों के आने बाद हुआ।
कोठों में शमां रोशन करने वालीं तबायफें अब तो इतिहास की किताबों में ही नसीब हो पा रही हैं, हां उनके याद को ताजा करने के लिये कोठियां आज भी चैक में आपके के दीदार को तरस रहीं हैं। जहां कभी पायलों की छम-छम और तबलों की थाप सुनायी दिया करती थी। मुंह में पान का वीणा दबायें बग्गी में बैठे नबाब यहां के तंग रास्तों घूमा करते थे। चैक की गलियां लखनऊ की नबाबी परंपरा का रुतबा हुआ करती थीं।
आज जैसा जालिम दौर न था कि तनहाई में शोषण किया, लूटा-लुटाया और नौ दो ग्यारह, वो जमाना जुबान का था तब बड़े-बड़े नबाबजादे शाम ढलते ही बग्गियों से ताम-झाम से तबायफों की कोठियों पर तशरीफ लाया करते थे और तो और लुकछिप कर ही नही, बल्कि बहुत से उदाहरण ऐसे हैं जहां कई नबाबजादों ने अपनी बेगम से ज्यादा इनको तबज्जो दी। नबाबी का मतलब शोषण आलिंगन ही नही था बल्कि तबायफों आकर्षक आदायें और उनकी शेरों शायरी उनकी विशेषता हुआ करती थी। बहुत सी तबायफें उर्दू अदब की लेखनी की नुमाइदगी करने वाली रही हैं। उनकी काबिलियत आज भी उर्दू पसन्दों के लिये पहेली बना हुआ है। कोठों पर ऐसी महफिलें सजती थीं कि आसपास के जमींदार, जगीरदार यहां शिरकत किया करते थे।
लखनऊ चैक में आज भी कई कोठियां ऐसी हैं जिनकी मलिकियत कोठों से सबंध रखती है और कई तो वर्तमान की भेंट चढ़ चुकीं हैं। यहां के नबाब इनसे कभी नही ऊबे लेकिन गोरों के आने के बाद से इनकी तबाही आरंभ हो गई। नतीजतन कोठों पर गोरी चमड़ी के हुक्मराॅनों को कहर। बेचारी दिल बहलाकर लोगों की तनहाई में संग रहने वाली ऐसी तबायफों को अपना शहर छोड़ आस पर के जिलों में पनाह लेनी पड़ी। सर्वाधिक कानपुर इनकी खपत हुई। जी हाॅ कानपुर शहर के लाठी मोहाल, मूलगंज, सुतरखाना ऐसे इलाके हैं जहां कभी मुजरा, सूफी गाने-बजाने के दौर चला करते थे। दरहम-फरहम हो चुकी तबायफों की जिन्दगी धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ने लगी। खूबसूरत अदायें और मीठी जुबान से लबरेज नौयौवनायें कमाई के लिये बनारस, फैजाबाद, सीतापुर, झांसी जैसे जिलों में भी गईं, जहां उन्हें वो रुतबा कभी भी हासिल नही हो सका और उनका धंधा गंदा होता चला गया।
सबसे अधिक गौर करने वाली बात यह है कि आजादी के लड़ाई में भी तबायफों की भूमिका रही है। यहीं कारण है कि अंग्रेज हुक्मराॅन शहर आते ही कहर इन्ही पर बरपाया करते थे। अंगे्रज कोठों की परंपरा को नजायज मानते थे, वहीं मुस्लिमों में तब नबाबी शौक समझा जाता था। लेकिन अंग्रेजों ने इन्हें तितर-बितर कर पूरी कौम को गंदा करने में अहम् भूमिका अदा की। वरना 1857 से पूर्व ये सब इतना गंदा नही जितना अंग्रेजों के आने बाद हुआ।





कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें